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महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधियों का रिकॉर्ड रखने वाला 9वां देश बना भारत

देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के दोषियों की निजी जानकारी को डेटा के रूप में रखने गुरुवार से नेशनल रजिस्ट्री ऑफ सेक्शुअल ऑफेंडर्स शुरुआत कर रहा है। इस शुरुआत के साथ ही भारत दुनिया का 9वां ऐसा देश बन जाएगा जो इस तरह का डेटा तैयार करते हैं। दरअसल सरकार को यह इसलिए करना पड़ा क्योंकि 2015 की तुलना में 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में करीब तीन फीसदी की बढ़ोतरी हुई जबकि बलात्कार की घटनाओं में 12 फीसद बढ़त हुई है। भारत की इस सूची में अपराधियों के नाम, फोटो, पता, फिंगरप्रिंट, डीएनए सैंपल, पैन और आधार नंबर दर्ज होंगे। अधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इस सूची में करीब 4.5 लाख मामले होंगे, जिसमें पहली बार अपराध करने वालों से लेकर बार-बार अपराध करने वालों के नाम होंगे। देशभर की जेलों से इसके बारे में जानकारी हासिल की गई है। यौन अपराधियों की रजिस्ट्री को नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो मेंटेन करेगी। अधिकारी के मुताबिक, इस रजिस्ट्री के जरिये कानून व्यवस्था का पालन करने में लगी एजेंसियों को बार-बार अपराध करने वालों की पहचान करना आसान होगा, जबकि लोग भी यौन अपराधों में संलिप्त व्यक्तियों के बारे में जागरूक हो सकेंगे। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 में दुष्कर्म के 34,651 दर्ज किए गए थे। वहीं, वर्ष 2016 में यह संख्या बढ़कर 38,947 पर पहुंच गए। वहीं, महिलाओं के खिलाफ सभी अपराधों की बात करें, तो वर्ष 2015 में तीन लाख 29 हजार 243 मामले दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2016 में इनकी संख्या बढ़कर तीन लाख 38 हजार 954 पहुंच गई। केवल सज़ा से यौन अपराध कम हो सकता है? डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘इंडियाज़ डॉटर’ ने असहज सवालों की एक लंबी फेहरिस्त सामने लाकर रख दी है. यह डॉक्यूमेंट्री यौन अपराधों के सिलसिले में दोषी करार दिए गए अपराधियों की यौन विकृतियों और सोच पर रोशनी डालती है.

प्रेषक लेख – डॉ. नेहा नेमा, असिस्टेट प्रोफेसर आलाप कालेज गुना मप्र सम्बद्ध माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल मप्र

यौन अपराध पर बहस शुरू हो गई है और लोग इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि इस फ़िल्म को दिखाने का क्या यह सही समय था, महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर इससे भारत की साख पर क्या असर पड़ेगा? लेकिन यौन अपराध एक मानसिक बीमारी भी है. ऐसे में क्या भारत के मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक-2013 में मनोविकृत यौन अपराधियों के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं? इसमें कोई शक़ नहीं कि समाज की सोच में बदलाव से हालात बदलेंगे लेकिन ऐसा होने में एक उम्र गुज़र जाएगी, इस बात को लेकर गहरी फिक्र होती है कि भारत में आज यौन अपराधियों से निपटने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के अलावा किसी और ज़रिए की गुंजाइश बहुत कम ही है, जैसा इस मामले में हुआ.जहां ऐसे दूसरे उपाय हैं वहाँ भी ऐसा कोई कानूनी उपाय नहीं है जिससे अपराध करने वाले व्यक्ति को दिमागी इलाज या अन्य किसी तरह से सहायता लेने के लिए बाध्य किया जा सके.पुनर्वास कार्यक्रम में इस तरह के किसी विशेष पुनर्वास कार्यक्रम के अभाव में अपराध फिर से करने के मामले और इसके दोबारा साबित होने की दर पहले से ज्यादा बनी रहती है. खासकर रिहा होने के पहले साल में यौन अपराधियों के पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रम में उनके ख़तरे, जरूरत और प्रतिक्रिया के सिद्धांतों का ख्याल रखा जाता है. इससे फिर से अपराध करने के मामलों में बड़े पैमानों पर कमी होती है | अधिक और बीच के स्तर के खतरे वाले यौन अपराधियों को पुनर्वास कार्यक्रम से सबसे अधिक फायदा होता है, आपराधिक व्यवहार यहां तक कि यौन अपराधी के ‘असामाजिक व्यवहार की समस्या’ को इसकी ‘कानूनी परिभाषा’ के दायरे में शामिल कर भी दिया जाता है तो ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत दोषी ठहराए गए अपराधी को फ़ॉरेंसिक अस्पताल भेजा जा सके, जहां उनके आपराधिक व्यवहार का मूल्यांकन और इलाज किया जाए. अगर ऐसा प्रावधान होता तो उनकी रिहाई को उनके व्यवहार को फिर से अपराध करने के खतरे से जोड़ कर देखा जाता. वे लोग जो इलाज में सहयोग नहीं करते तो समुदाय में उन पर नज़र रखी जा सकती और खतरे का कोई निदान नहीं दिखता तो उन्हें दोबारा से अस्पताल भेजा सकता. गंभीर खतरा हालांकि इससे संबंधित नया विधेयक ‘मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति’ के इलाज के अधिकार का प्रावधान करता है | लेकिन इसमें ऐसे अपराधी की बात नहीं कही गई है जो इलाज के बारे में कोई फैसला कर सकने की स्थिति में नहीं हैं और जो दूसरे लोगों के लिए गंभीर खतरा बने हुए है | जो अपराधी इलाज का फैसला लेने की स्थिति में हैं लेकिन इसके लिए सहयोग नहीं कर रहे हैं, उनको लेकर भी नया कानून साक्ष्य आधारित अनिवार्य इलाज का प्रावधान करने में नाकाम रहा है | जोखिम की स्थिति इस विधेयक में यह संभावना है कि मानसिक रूप से बीमार अपराधियों से जुड़ी खामी को दूर किया जा सकता है और इसके साथ ही देश में फ़ॉरेंसिक साइक्रेट्री (मनोचिकित्सा) से जुड़ी सेवाओं की फौरी शुरुआत का रास्ता निकाला जा सकता है | अपने मौजूदा स्वरूप में इस कानून से बहुत कम उम्मीद है,कि समाज में यौन अपराधियों के खतरे का निदान निकल पाएगा | समस्या के समुचित मूल्यांकन को नजरअंदाज करने से कानून बनाने वालों और इसे लागू करने वालों के लिए जोखिम की स्थिति बन गई है | मौजूदा स्वरूप में इस विधेयक से यौन अपराधियों पर कोई लगाम लगने की संभावना कम ही है |

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